Sunday, March 23, 2008

तब लोगों को मेरी याद आएगी

आज भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु ( Bhagat Singh - Sukhdev- Rajguru) की शहादत का दिन है। हालाँकि किसी को पुण्यतिथि या जन्‍मदिन पर याद करना, औपचारिकता ही लगती है। इसके बावजूद यह औपचारिकता कई बार जरूरी है। खासतौर पर उस वक्‍त जब हम देशभक्ति की बातें तो बड़ी-बड़ी करें पर देश में रहने वाले लोगों के बारे में ज़रा भी न सोचें। इसी बात को याद दिलाने के लिए भगत सिंह (Bhagat Singh) की रचनाओं में से चुनी गई कुछ लाइनें यहाँ पेश है।

भगत सिंह (Bhagat Singh) के चंद विचार
Inquilab Jindabaad

''चारों ओर काफी समझदार लोग नज़र आते हैं लेकिन हरेक को अपनी जिंदगी खुशहाली से बिताने की फिक्र है। तब हम अपने हालात, देश के हालात सुधरने की क्‍या उम्‍मीद कर रहे हैं।''

(1928)

'' वे लोग जो महल बनाते हैं और झोंपडि़यों में रहते हैं, वे लोग जो सुंदर-सुंदर आरामदायक चीज़ें बनाते हैं, खुद पुरानी और गंदी चटाइयों पर सोते हैं। ऐसी स्थिति में क्‍या करना चाहिए? ऐसी स्थितियाँ यदि भूतकाल में रही हैं तो भविष्‍य में क्‍यों नहीं बदलाव आना चाहिए? अगर हम चाहते हैं कि देश की जनता की हालत आज से अच्‍छी हो, तो यह स्थितियाँ बदलनी होंगी। हमें परिवर्तनकारी होना होगा।''

(अगस्‍त 1928)

'' हमारा देश बहुत अध्‍यात्मिक है लेकिन हम मनुष्‍य को मनुष्‍य का दर्जा देते हुए भी हिचकते हैं।''

'' उठो, अछूत कहलाने वाले असली जन सेवकों तथा भाइयों उठो... तुम ही तो देश का मुख्‍य आधार हो, वास्‍तविक शक्ति हो... सोए हुए शेरों। उठो, और बग़ावत खड़ी कर दो।''

(अछूत समस्‍या 1928)

'' संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्‍ट्र के हों, हक एक ही हैं।''

'' धर्म व्‍यक्ति का निजी मामला है, इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं, न ही इसे राजनीति में घुसना चाहिए।''

(1927)

''जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्‍दीली से लोग हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और घोर निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है, अन्‍यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है।''

''अंग्रेजों की जड़ें हिल गई हैं और 15 साल बाद में वे यहाँ से चले जाएँगे। बाद में काफी अफरा-तफरी होगी तब लोगों को मेरी याद आएगी।''

(12 मार्च 1931)

''मैं पुरजोर कहता हूँ कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर जीवन की समस्‍त रंग‍ीनियों से ओतप्रोत हूँ। लेकिन वक्‍त आने पर मैं सबकुछ कुरबान कर दूँगा। सही अर्थों में यही बलिदान है।''

(सुखदेव के नाम पत्र, 13 अप्रैल 1929)

जहाँ तक प्‍यार के नैतिक स्‍तर का सम्‍बंध है... '' मैं कह सकता हूँ कि नौजवान युवक-युवतियाँ आपस में प्‍यार कर सकते हैं और वे अपने प्‍यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं।''

(सुखदेव को पत्र , 1928)

(इंकलाब-जिंदाबाद पोस्‍टर परिकल्‍पना व डिजायन- न‍ासिरूद्दीन)

Thursday, October 18, 2007

बीते कल से सबक सीखने का समय

सन् 1857 में जो हिन्‍दुस्‍तान के लिए लड़े, आज उनके वारिसों की हालत कैसी है और जिन्‍होंने अंग्रेजों का साथ दिया, उनके वशंज आज किस हालत है। युवा इतिहासकार अमरेश मिश्र इसका आकलन कर रहे हैं। इस आकलन की पहली किस्त कल हमने पोस्ट की थी। आज इसकी दूसरी और आखिरी किस्‍त अमर उजाला में छिपी है। हम अमर उजाला से साभार इसे यहां दे रहे हैं।

उग्रराष्ट्रवाद और पश्चिम परस्ती का घालमेल खतरनाक

अमरेश मिश्र
अंगरेजों ने मार्च, 1858 में अपनी सारी सैन्य ताकत और सभी सहयोगियों को बटोरकर लखनऊ और अवध के क्रांतिकारियों को कुचलने का अभियान छे़ड दिया। नेपाल और कपूरथला के राजा अपने सैनिकों को लेकर ब्रिटिश सेना के साथ थे। 1859 के बाद कपूरथला राजा और दूसरे अंगरेज समर्थक गैर-खालसा सिख सहयोगियों को अवध और गोरखपुर में काफी जमीनें दे दी गईं। देवी सिंह जैसे अंगरेज विरोधी बिसेन तालुकदारों की जमीनें 'विश्वासभाजन' बलरामपुर राजा को दे गई। प्रमुख बैस तालुकदार बेनी माधो की जमीनें भी अंगरेजों के कब्जे में चली गईं। मुरादाबाद के नवाब मज्जू खान और उनके सहयोगी ठाकुर कुंदन सिंह की संपत्ति रामपुर के नवाब खासमखासों को दे दी गईं। मैनपुरी और एटा में भदौरिया, गौतम और चौहान राजपूतों को भी अपनी संपत्तियों से हाथ धोना पड़ा। उनकी जमीनें अंगरेज समर्थक बनियों और खत्रियों को दे दी गईं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में अंगरेज विरोधी भूमिहारों की संपत्ति बनारस के राजा के हवाले कर दी गईं और वह देश के सबसे बड़े अमीरों में शुमार किए जाने लगे।

आज भी उत्तर प्रदेश का परिदृश्य कुछ खास नहीं बदला है। बनारस के राजा समेत जिन घरानों ने अंगरेजों का साथ दिया था, वे धनाढ्य हैं। शहरों में अधिकांश संपत्तियों पर खत्रियों व बनियों का ही नियंत्रण है। लेकिन सबसे ज्यादा खराब हालत उत्तर प्रदेश-बिहार-राजस्थान-मध्य प्रदेश (हिंदी-उर्दू क्षेत्र) के उलेमाओं और सनातन धर्मी साधुओं की है। 1857 में हिंदी-उर्दू क्षेत्र के उलेमाओं ने अंगरेजों के खिलाफ कम से कम सात जिहाद की अगुआई की।

ज्यादातर अंगरेज विरोधी उलेमा 18वीं सदी के शाह वलीउल्ला के नए इसलामी दर्शन से प्रभावित थे। उलेमाओं के खिलाफ अंगरेजों की प्रतिहिंसा अभूतपूर्व थी। लेकिन अंगरेजों के इन अमानवीय कृत्यों ने ब्रिटिश-विरोधी देवबंद स्कूल की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। 20वीं सदी में वही देवबंद स्कूल आजादी के दीवानों को पैदा करने वाली फैक्टरी के रूप में विकसित हुआ। 20वीं सदी के मशहूर उलेमा मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने मोहम्मद अली जिन्ना और मुसलिम लीग के 'द्विराष्ट्र सिद्धांत' का विरोध किया था। मौलाना मदनी का साझा राष्ट्रवाद का सिद्धांत गांधी और पंडित नेहरू के विचारों के काफी करीब और कई मायने में उनसे ज्यादा असरदार था। इसके बावजूद 1857 के उलेमाओं, देवबंद और मौलाना मदनी के क्रांतिकारी योगदान को स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास में याद भी नहीं किया जाता है। यूपी-बिहार के उलेमा गुरबत में जी रहे हैं और उनके संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद को कभी वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह हकदार है। उन्हें आज भी वहाबी कहा जाता है, जबकि वे वलीउल्ला के अनुयायी हैं।

इसी तरह नगा साधुओं और गोसाइंयों के सनातन धर्म अखाड़ों ने अनूप गिरि गोसाईं के नेतृत्व में अंगरेजों से खूब लोहा लिया। इन अखाड़ों ने अवध, राजस्थान, उज्जैन, माहेश्वर, नासिक और गुजरात में धर्मयुद्ध का फतवा जारी किया था। 1857 से जु़डी अंगरेजों की प्रतिहिंसा में 30 लाख से ज्यादा सनातन धर्मी साधु मारे गए थे। इसके बावजूद स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका का जिक्र तक नहीं किया जाता है।आज उन अखाड़ों की हालत दयनीय है। इसके ठीक विपरीत, महंत अवैद्यनाथ की अगुआई में गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मठों की समृद्धि देखते बनती है।

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी 1857 में अंगरेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। शिर्डी के साइंर्बाबा भी उस दौरान सक्रिय थे और वह खुद लक्ष्मीबाई को आशीर्वाद देने पहुंचे थे। इसके बावजूद आज स्वामी अग्निवेश सरीखे आर्य समाजी की पहचान व्यवस्था विरोधी की बन गई है। दूसरी तरफ, शिर्डी के साइंर्बाबा की सूफी परंपरा को जिन 'नए' साइंर्बाबा ने हथिया लिया है, उनका 1857 से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है।

वर्तमान मध्य प्रदेश, विदर्भ और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जबलपुर-दमोह के लोध, बुंदेला व बघेल राजपूतों और गोंडों ने भी 1857 में अंगरेजों का विरोध किया था। अंगरेज खासकर महाकोशल-नर्मदा के लोधों से बहुत डरते थे। दूसरी तरफ, ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होलकर और नागपुर के भोंसले घरानों ने अंगरेजों से हाथ मिला लिया था। आज इन्हीं घरानों की तूती बोल रही है, जबकि राजपूत, लोध और गोंड हाशिये पर जीने को अभिशप्त हैं। पश्चिमी भारत में अंगरेजों के खिलाफ हथियार उठाने वालों में महार, मराठा, कुनबी, चितपावन और देशहता ब्राह्मण, रामोशी, कोली और भील प्रमुख थे। आरक्षण से हुई प्रगति के बावजूद महार 17वीं-18वीं सदी के अपने उत्कर्ष काल से कोसों दूर हैं। अंगरेजों के जमाने से ही रामोशियों की पहचान अपराधियों के रूप में की जा रही है। मराठी कुनबियों की हालत भी अच्छी नहीं है। गुजरात में मुसलमानों, भीलों, कोलियों और पाटीदारों ने अंगरेजी शासन को चुनौती देने का साहस किया था। सौराष्ट्र में वघेरों ने भी यह भूमिका निभाई थी। इसलिए आश्चर्य नहीं है कि स्वातंत्र्योत्तर गुजरात में कोली, भील, वघेर, दलित और मुसलमान आज काफी पिछड़े हुए हैं।

दक्षिण भारत में 1857 में रेड्डी अभिजात वर्ग के कम्मा और कापू खेतिहर समुदाय, आंध्र के गिरिजन जनजाति, कर्नाटक के लिंगायत, तमिलनाडु के थेवर और वन्नियार और केरल के मोपला अंगरेजों के खिलाफ लड़े। पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर पूर्व के दूसरे क्षेत्रों में अंगरेजों के खिलाफ लड़ने वाले आज अच्छी हालत में नहीं हैं। 1947 के बाद का इतिहास भी देखा जाए, तो 1857 में अंगरेजों के खिलाफ हथियार उठाने वाले परिवारों और समुदायों में एकाध अपवाद को छोड़कर किसी को समृद्धि और ख्याति नसीब नहीं हुई। दरअसल, आज भी उन परिवारों और समुदायों को 'उपद्रवी' के रूप में ही चिन्हित किया जाता है।

अगर देश के 100 या 500 सबसे ज्यादा अमीर पुरुषों और महिलाओं की फेहरिस्त बनाई जाए, तो उसमें 1857 में ब्रिटिश-विरोधी रहे परिवारों या समुदायों में से एक भी नाम शामिल नहीं होगा। यह एक बड़ी कमी है, जिसने स्वातंत्र्योत्तर भारतीय प्रजातांत्रिक पूंजीवादी राज्य और उसकी व्यवस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन, राज्य और उसकी व्यवस्था न सिर्फ रुढ़िवादी बल्कि 'सॉफ्ट' और गैर-राष्ट्रवादी भी नजर आ रही है। अति-उग्रराष्ट्रवाद और पश्चिम परस्त मानसिकता एक-दूसरे की पूरक हैं। जितनी जल्दी इस समस्या को दूर किया जाए, इस देश के लिए उतना ही अच्छा होगा। जो लोग इतिहास से नहीं सीखते, वे उसे दोहराते रहने के लिए अभिशप्त होते हैं। इतिहास से यह सबक मिलता है कि जो सामाजिक समूह, समुदाय और परिवार राष्ट्रीय राजनीति में अपने योगदान के बारे में ठगा हुआ महसूस करते हैं, आखिरकार प्रतिशोध के लिए हमला करते हैं। (समाप्त)

Wednesday, October 17, 2007

और गुरबत में हैं क्रांतिकारियों के वंशज

सन् 1857 भारतीय इतिहास में एक महत्‍वपूर्ण मोड़ है। इसने न सिर्फ भारतीय राजनीति और शासन की दिशा बदली बल्कि आने वाले समय में सामाजिक सम्‍बंधों और समुदायों के विकास पर जबरदस्‍त असर डाला। यह असर आज भी महसूस किया जा सकता है। अमर उजाला के 17 अक्‍तूबर के अंक में अमरेश मिश्र का इसी मुद्दे पर केन्द्रित एक लेख छपा है। 1857 पर हिन्‍दी और अंग्रेजी में सबसे सक्रिय लेखन अमरेश मिश्र कर रहे हैं। उन्‍होंने कई चीज़ों को गर्दो गुबार के ढेर से सामने लाने की कोशिश की है। उनकी कई स्‍थापनाओं पर विवाद भी है। इसके बावजूद जो तथ्‍य वे सामने लेकर आ रहे हैं, वे बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर कर देते हैं। अमर उजाला से साभार यह लेख शहीद-ए-आज़म के पाठकों के लिए।

1857 में अंगरेजों का साथ देने वालों पर खूब बरसी समृद्धि
अमरेश मिश्र
बहादुरशाह जफर के एक वंशज द्वारा लाल किला की संपत्ति पर दावा ठोकने संबंधी खबर ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है कि 1857 में अंगरेजों के खिलाफ जिन परिवारों और समुदायों ने हथियार उठाए थे, वे आज किस हाल में हैं?

1857 को भारत की आजादी की पहली जंग कहा जाता है। अगर ऐसा है, तो क्या कारण है कि जिन परिवारों ने अंगरेजों का समर्थन किया, वे आजादी के बाद समृद्ध होते चले गए, जबकि अंगरेजों से लोहा लेने वाले टीपू सुल्तान, बहादुरशाह जफर और वाजिद अली शाह के वंशज गुरबत में जी रहे हैं?
कई समुदायों के साथ भी यही हुआ। गुर्जरों की ही मिसाल लीजिए। राजस्थान के टोंक से लेकर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में गुर्जर क्रांतिकारी 10 मई, 1857 से 1859 के अंत तक सक्रिय रहे। ब्रिटिश अफसरों ने गुर्जर 'उपद्रव' की कटु आलोचना की थी। आज गुर्जरों में इतनी ज्यादा बेरोजगारी है कि घुमंतुओं और व्यापारियों का यह गर्वीला समुदाय अनुसूचित जनजाति की हैसियत पाने के लिए संघर्ष करने को मजबूर है। मुसलमान मेवातियों की कहानी इससे भी ज्यादा दु:खद है। 1857 में इलाहाबाद से हरियाणा व पूर्वी राजस्थान तक मेवाती या मेव अंगरेजों से डटकर लड़े। दरअसल, इलाहाबाद के मेवों ने दिल्ली के किले को बचाने के लिए जान की बाजी लगा दी थी
रूहेलखंड में कई राजस्थानी मेव अंगरेज सैनिकों के हाथों मारे गए थे। मुगल-मराठा शासनकाल के दौरान मेवों की पहचान समृद्ध किसानों और चर्म व्यापारियों के समुदाय के रूप में थी। लेकिन आज उन्हें पिछड़ा कहा जाता है। उन्हें आरक्षण का भी लाभ नहीं मिला।

1857 में खेतिहर जाटों में हरियाणा और दिल्ली-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सलकलैन, मावी, दहिया और हुडा गोत्रों ने दूसरे जाट गोत्रों को साथ लेकर अंगरेजों के छक्के छु़ड़ाए थे। ठीक इसके विपरीत अहलावत और घटवाल गोत्रों ने अंगरेजों का साथ दिया था। वर्तमान में कुछ अपवादों को छोड़कर सलकलैन, मावी, दहिया और हुडा गरीब या मध्यवर्ती किसान हैं, जबकि अहलावत और घटवाल दिल्ली-हरियाणा के सबसे समृद्ध जाट गोत्रों में शुमार हैं। इसी तरह रेवाड़ी और हरियाणा के अंगरेज-विरोधी राव-अहीरों में भी कुछ लोगों को छोड़कर बाकी मध्यवर्ती या गरीब किसान हैं। मुसलमान रांगड़ और भट्टी जैसे हरियाणा के दूसरे ब्रिटिश-विरोधी समुदायों पर अंगरेजों के जातिसंहार का ऐसा कहर बरपा था कि 1857 के बाद उनका सफाया ही हो गया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलितों में वाल्मीकियों और जाटवों ने 1857 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज उनकी स्थिति खराब है।

19वीं सदी में दिल्ली शहर के अंदर पूरबिया-पश्चिमिया कामगारों और 1803 से पूर्व के मुगल-मराठा काल के मुसलमान और खत्री अभिजात वर्ग ने अंगरेजों का विरोध किया। जबकि 1803 के बाद के खत्री और पंजाबी हिंदू अभिजात वर्ग ने उनका समर्थन किया था। 1857 के दौरान दिल्ली के बाहर के पूरबिया किसान सिपाहियों ने 1803 के बाद के खत्री-हिंदू पंजाबी अभिजात वर्ग को बेदखल करने के लिए दिल्ली के पूरबिया-पश्चिमिया कामगारों और हरियाणा के जाट-गुर्जर-पश्चिमिया किसानों को अपने साथ लिया था।

हैरानी की बात नहीं है कि 1803 के बाद के दिल्ली के अभिजात वर्ग ने 1857 में अंगरेजों का साथ दिया था। 1857 के मई से सितंबर तक दिल्ली उपनिवेश-विरोधी लड़ाई के साथ-साथ एक भारी आंतरिक वर्गीय और सांस्कृतिक संघर्ष का भी गवाह बनी थी। खत्री-पंजाबी हिंदू अभिजात वर्ग को क्रांतिकारी दहशत का दंश झेलना पड़ा था। 21 सितंबर, 1857 के बाद ब्रिटिश प्रतिहिंसा ने क्रांति-विरोधी आतंक का रूप धारण कर लिया। ब्रिटिश अफसरों ने कूचा चीलन, बल्लीमारान, दरीबा, फरहत बख्श और जामा मसजिद इलाके में मुसलमानों की संपत्तियों और मोहल्लों को तबाह कर दिया। उन मोहल्लों के हजारों मुसलमानों को यमुना के किनारे रस्से से बांधकर गोली से उड़ा दिया गया। उनमें मशहूर विद्वान, लेखक, कवि और मौलवी भी शामिल थे। हिंदू पूरबिया और पश्चिमियों का भी वही हश्र हुआ।

उन मोहल्लों में जो कुछ भी शेष रह गया था, वह 1947 में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगे के दौरान लूट लिया गया। हजारों मुसलमान मार डाले गए। पुरानी दिल्ली में शवों के अंबार कई दिन तक सड़ते रहे। हाल में हुए शोध से, जिनमें एलेक्स वॉन तुंजेलमान लिखित 'द इंडियन समर : सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ द एंड ऑफ ऐन एंपायर` भी शामिल है, पता चलता है कि यह सिर्फ सांप्रदायिक दंगा नहीं था। दरअसल, यह मुसलमान-विरोधी बगावत थी। दूसरे शब्दों में यह विभाजन के बाद अस्तित्व में आए नए भारतीय राज्य की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद के खिलाफ दक्षिणपंथ का विद्रोह था। इस दौरान दंगाइयों ने किसी सैन्य शक्ति की तरह मशीन गन, ग्रेनेड और मोर्टार का योजनाबद्ध तरीके से इस्तेमाल किया। इस बगावत के पीछे आरएसएस का हाथ था। इस काम में आरएसएस को अंगरेजों और खत्री-पंजाबी हिंदू के उसी गठबंधन का साथ मिला, जिसने 1857 में भी अंगरेजों का समर्थन किया था।

आज के उत्तर प्रदेश में हर क्षेत्र में कुछ 'खास' सामाजिक शक्तियां हैं, जिन्होंने अंगरेजों से लोहा लिया था। उन शक्तियों में मध्य दोआब के भदौरिया, चौहान और गौतम राजपूत, ब्रज-अलीगढ़ मथुरा के जाट और अहीर, रूहेलखंड के रोहिल्ला पठान, शेख, सैयद, राजपूत, दलित, अहिर और कुर्मी, कन्नौज, लखनऊ और उत्तरी अवध के कान्यकुब्ज ब्राह्मण, पूर्वी और दक्षिणी अवध के सरयूपारी ब्राह्मण, उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी अवध के बैस, रैकवार, बिसेन, बचगोटी, अंबन और जंवार राजपूत, आजमगढ़ के पुलवार राजपूत, जौनपुर और बनारस के राजकुमार राजपूत, भदोही के मोना राजपूत, बनारस-गोरखपुर क्षेत्र के जुलाहा मुसलमान, सीतापुर और अवध के पासी, सुल्तानपुर के कोइरी, बाराबंकी के कुर्मी, बुंदेलखंड के बुंदेला राजपूत और दलित, गाजीपुर के भूमिहार, फर्रुखाबाद के नवाब का बंगश पठान परिवार, बेगम हजरत महल की अगुआई में वाजिद अली शाह का परिवार, बंदा नवाब शामिल हैं। मुगल-मराठा काल में ये सभी परिवार या समुदाय काफी धनाढ्य हुआ करते थे। हालांकि उनमें से कुछ तो ब्रिटिश शासन काल के दौरान भी अपनी समृद्धि की रक्षा करने में सफल रहे थे, लेकिन सिद्धांत और राष्ट्र से प्रेम के कारण उन्होंने अंगरेजों का विरोध किया।

इसके ठीक विपरीत अवध के बलरामपुर राजा, रूहेलखंड के रामपुर नवाब, बनारस के राजा और बुंदेलखंड के चिरखारी राजा ने अंगरेजों का साथ दिया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दोआब और बुंदेलखंड के बनिया व खत्री और मारवाड़ियों ने भी अंगरेजों का समर्थन किया था। (... जारी)

Sunday, October 07, 2007

क्‍या आप दुर्गा भाभी को जानते हैं

दुर्गा भाभी जिनकी आज सौवीं सालगिरह है

durga bhabhi1 जेण्‍डर विभेद सिर्फ परिवारों में ही नहीं होता बल्कि समाज के हर क्षेत्र में इसका बोलबाला है। फिर चाहे वो क्रांतिकारियों को याद करने का ही मामला क्‍यों न हो। आजादी के लिए जान न्‍योछावर करने वाले को ही हम कितना याद करते हैं, यह खुद एक सवाल है। महिला क्रांतिकारियों की तो बात जाने दें। इसके बावजूद पुरुष क्रांतिकारी के बारे में फिर भी कुछ पता होता है, महिला क्रांतिकारियों के बारे में तो तलाशने पर भी मुश्किल से जानकारी मिल पाती है। आज ऐसी ही एक महिला क्रांतिकारी की पैदाइश का दिन है... उनकी पैदाइश की सौवीं सालगिरह।

एक दृश्‍य- पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की शहादत के बाद अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्‍या। हत्‍यारों की तलाश में हर जगह जबरदस्‍त मोर्चाबंदी। लाहौर रेलवे स्‍टेशन। 18 दिसम्‍बर 1928। चार लोग। दो मर्द, एक औरत और एक बच्‍चा। इनमें दो लोग पति-पत्नी थे और बच्‍चे के साथ ट्रेन के पहले दर्जे के डिब्बे में बैठे। नौकर तीसरे दर्जे में था। ये और कोई नहीं बल्कि वे क्रांतिकारी थे, जिन्‍होंने पंजाब केसरी की मौत का बदला लिया था। पति के रूप में भगत सिंह थे तो पत्‍नी दुर्गावती देवी थीं और नौकर सुखदेव। दुर्गावती देवी, एक और क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की जीवन साथी और बाकि क्रांतिकरियों की दुर्गा भाभी। और इस तरह दुर्गा भाभी ने साहसी काम कर दिखाया और भगत सिंह को अपना शौहर बनाकर लाहौर से अंग्रेजों के जबड़े से निकालकर कलकत्‍ता पहुँचा आयीं।

आने वाले दिनों में भगत सिंह ने जो किया, वो उन्‍हें शहीदे आज़म के दर्जे तक ले गया और उनकी जन्‍म शताब्‍दी का भी यह साल है। पर उनके साथ ही यह साल दुर्गाभाभी की भी जन्‍म शताब्‍दी का साल है। भगत सिंह तो याद रहे पर दुर्गा भाभी आज के क्रांतिकारियों को भी याद नहीं रहीं। यहां तक कि इंटरनेट, जिसे जानकारी का खजाना माना जाता है, वहां भी दुर्गा भाभी के बारे में न तो जानकारी मिलती है, फोटो की बात तो दूर है। भगत सिंह 28 सितम्‍बर 1907 में पैदा हुए थे और दुर्गा भाभी उसी साल सात अक्‍टूबर को इलाहाबाद में। 11 साल की उम्र में उनकी शादी लाहौर के भगवती चरण वोहरा से हुई। भगवती चरण वोहरा पढ़ाई के दौरान क्रांतिकारी आंदोलन के हिस्‍सा बन गये और उनके साथ ही दुर्गावती देवी भी कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगीं। ये दोनों भगत सिंह के काफी करीब थे। क्रांतिकारी आंदोलन के जो भी खतरे थे, दुर्गा भाभी ने वो सारे खतरे उठाये और एक मजबूत क्रांतिकारी बन कर उभरीं। भगत सिंह और उनके साथियों को जब सजा हो गयी तो उन्‍हें छुड़ाने की योजना बनी। लाहौर में बनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने भी इनका योगदान था। इसी योजना के तहत बम बन रहे थे। उन बम का परीक्षण रावी नदी के तट पर होना तय हुआ। परीक्षण के दौरान ही बम फट गया और भगवती चरण वोहरा की मौत हो गयी... और दुर्गा भाभी को आखिरी वक्‍त में उनका चेहरा भी देखने को नहीं मिला। इस व्‍यक्तिगत और भयानक हादसे के बावजूद वो डिगी नहीं... टूटी नहीं। आंदोलन का हिस्‍सा बनी रहीं।

इसी दौरान क्रांतिकारियों ने बम्‍बई के अत्‍याचारी गर्वनर हेली को मारने की योजना बनाई गयी। इस योजना को अंजाम देने वालों में दुर्गा भाभी भी थीं। उन्‍होंने गोलियां भी चलाईं। लेकिन यह वक्‍त क्रांतिकारी आंदोलन के उरुज और अवसान दोनों का था। एक एक करके क्रांतिकारी आंदोलन के बड़े कारकुन शहीद हो गये... भगवती चरण वोहरा, शालिग्राम शुक्‍ल, चन्‍द्रशेखर आजाद और फिर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु। इस हालत में भी दुर्गा भाभी आंदोलन को आगे बढ़ाने की कोशिश्‍ा करती रही। वे पुलिस की पकड़ में भी आयीं। जेल भी गयी और नजरबंद भी रहीं। सन् 1936 में वे गाजियाबाद आ गयीं। फिर लखनऊ। 20 जुलाई 1940 को उन्‍होंने लखनऊ में पहला मांटेसरी स्‍कूल स्‍थापित किया। उन्‍होंने अपना मकान शहीदों के बारे में शोध के लिए दान दे दिया। आखिरी वक्‍त में वे अपने पुत्र शचीन्‍द्र वोहरा के पास गाजियाबाद चली गयी थीं। इस महान क्रांतिकारी ने 14 अक्‍तूबर 1999 को 92 साल की उम्र में हमेशा के लिए इस जहाँ से विदा ले लिया।

जिसने अपने सुख दुख की परवाह किये बगैर, बिना कुछ चाहने की ख्‍वाहिश रखे अपना सब कुछ दॉंव पर लगा दिया हो, उस महान महिला क्रांतिकारी को याद रखना हमारी जिम्‍मेदारी है। क्‍या हम उस जिम्‍मेदारी को निभा रहे हैं।

Friday, September 28, 2007

घोड़ी भगत सिंह शहीद

आज भगत सिंह की सा‍लगिरह है। जिंदा रहते तो आज, भगत सिंह सौ साल के होते। लेकिन शहीद भगत सिंह विचार के रूप में एक मज़बूत विरासत हमारे लिये छोड़ गये। कल हमने इरफान हबीब का विचार पढ़ा था... आज लोकमानस में रचे बसे भगत सिंह के बारे में पढि़ये-

चमन लाल

... डॉ गुरुदेव सिंह सिद्धू के सम्पादन में 'सिंघ गरजना' शीर्षक से भगत सिंह से सम्बंधित पंजाबी कविताओं का एक संकलन पंजाबी विश्वविद्यालय ने 1992 में प्रकाशित किया था और अभी 2006 में इन्हीं के सम्पादन में पंजाबी में 'घोडि़या शहीद भगत सिंह' संकलन छपा है। ...
'घोड़ी' पंजाबी भाषा का लोकगीत रूप है, जिसमें दूल्हा बारात जाने और दुल्‍हन लाने के लिए चलते समय घोड़ी पर चढ़ता है और उसके पीछे 'सरवाला', जो अक्‍सर उसका छोटा भाई होता है, वह बैठता है। भगत सिंह के संदर्भ में 'घोड़ी' लोकगीत रचने वाले लोक कवियों ने 'मौत' को भगत सिंह की दुल्हन के रूप में चित्रित करते हुए भगत सिंह को चाव से अपनी दुल्हन को प्राप्त करने का बिम्ब सृजित किया है। 'मौत' यानी 'फांसी' पर चढ़ते जाते वक्‍त भगत सिंह का दूल्हे की तरह घोड़ी पर चढ़कर जाना लोकमानस का ऐसा बिम्ब है, जिसने भगत सिंह को सदियों तक के लिए लोकमानस में ऐसे प्रतिष्ठित कर दिया है कि उसका हाल में उभरकर आया वैचारिक पक्ष उसे और सुदृढ़ तो कर सकता है, लेकिन उस बिम्ब को बदल नहीं बदल सकता।

पंजाबी (गुरमुखी व फ़ारसी- दोनों लिपियों में) 1931 के आसपास मिलते-जुलते शब्दों वाली भी कई घोडि़यां छपीं। शायर मेला राम 'तायर' व महिन्दर सिंह सेठी अमृतसरी की 'घोडि़यों' के कई हिस्से मिलते-जुलते हैं। शायर तायर ने 23 मार्च 1932 को लाहौर में भगत सिंह की शहादत के एक बरस बाद यहां प्रस्तुत 'घोड़ी' को तांगे पर चढ़कर बाज़ार में गाया। इस घोड़ी सम्बंधी, हिन्दी-पंजाबी लेखक गौतम सचदेव ने 'हुण' (जनवरी-अप्रैल 2007) अंक में दिलचस्प किस्सा बयान किया है। गौतम सचदेव के अनुसार उसके ससुर राम लुभाया चानणा स्वतंत्रता सेनानी थे और 1998 में संयोग से गौतम की भेंट इस घोड़ी के शायर तायर से हो गयी, जो उस समय सौ बरस के हो चुके थे, लेकिन उस उम्र में भी उन्हें घोड़ी पूरी तरह याद थी और गौतम ने टेपरिकार्डर में तायर की यादें और घोड़ी उन्हीं के स्वर में रिकार्ड की। इसी घोड़ी को 'लीजेंड ऑफ भगत सिंह' फि़ल्म में भी गीत के रूप में इस्तेमाल किया गया।
भगत सिंह शताब्दी वर्ष... में इस घोड़ी का देवनागरी में लिप्यन्तरण व हिन्दी में भावार्थ प्रस्‍तुत किया जा रहा है।

घोड़ी भगत सिंह शहीद

आवो नी भैणों रल गावीए घोडि़यां
जँआं ते होई ए तियार वे हां
मौत कुड&#